- प्रणाम पर्यटन

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गुरुवार, 4 मार्च 2010

       चारमीनार :नील गगन की
       छांव में लिखी एक कविता
नवाबों का शहर हैदराबाद ,हैदराबाद में तहजीब और इसके मिजाज की एक यादगार धरोहर "चारमीनार "पिछले चार सौ साल से एक खामोश सिपाही की तरह खडा शहर की हिफाजत करता आ रहा है. लेकिन हम आज तक अपनी इस विरासत की हिफाजत नहीं कर पाए ,बरसों की उपेछा और प्रदुषण के बेसुमार मार झेलकर यही चारमीनार अब अपनी चमक और शान-ओ-शोकत खोती जा रही है.वास्तुशिल्प की इस अदभुत 55 मीटर ऊँची गगनचुम्बी अभिनव रचना का निर्माण 1591 में मुहमद कुली कुतुब शाह ने कराया था.जिसकी वास्तु शिल्प को देख कर कहा जा सकता है कि "नील गगन  कि छावं में लिखी एक कविता कि मानिंद हैं,जिसकी मीनारें छंद हैं.जिनसे इस काव्य कि रचना पूरी होती है.इस धरोहर रूपी काव्य के रचयिता शहंशाह कुली कुतुब शाह स्वयं एक अजीम शायर थे, कहते हैं है कि जब उनकी यह काव्य प्रस्तर पर  उकेरी जा चुकी तो उन्हों ने सबसे पहला काम किया कि इसके नक्शे को ही नष्ट  कर दिया.जिससे कोई और दूसरे शहर में इसकी प्रतिकृति न बना सके.कहते हैं कि   मुहमद कुली क़ुतुब शाह का दिल मूसा नदी के उस पार के एक गाँव कि रहने वाली एक युवती पार आ गया ,जिसका नाम भागमती था ,
 भागमती बेहद सुन्दर हिन्दू कन्या थी,साधारण परिवार कि रहने वाली भागमती में सोंदर्य के साथ नृत्य  एवं गायन की कला भी कूट-कूट कर भरी थी.जिसके प्रेम पाश में कुली क़ुतुब शाह इस कदर बंध गया था कि उसे मूसा नदी के उसपर भागमती से मिलने जाने में कठिनाई होती,यह बात उसके पिता तक पहुंची,जिसपर पिता ने अपनी मानमर्यादा कि परवाह न करते हुवे दुनिया के सामने प्रेम कि एक मिशाल पेश करते हुवे मूसा नदी पार पुल ही बनवा दिया. जब सन1580 में कुली क़ुतुब शाह ने सत्ता सँभालते ही भाग मति से विवाह कर लिया.इसी के बाद उसके मन में गोलकोंडा से अलग हट कर एक नया शहर  बसाने का विचार आया. उस नए शहर का नाम अपनी पत्नी भागमती के नाम पार भाग्य नगर रखा इतिहास के पन्ने बताते हैं कि जब 1596 में शहर बनकर तैयार हो गया तो बादशाह ने मरे खुशी के अपनी पत्नी भागमती का नाम हैदर महल कर दिया. कहते हैं कि उसी के बाद इस शहर का नाम हैदराबाद  हो गया जो आज तक चला आ रहा है.
 इसी  हैदराबाद शहर में शान के साथ आज भी खड़ा चार मीनार ताजमह कि तरह प्रेम मुहब्बत कि बयां करता है. चार मीनार कि रचना के पीछे भी एक कहानी बताई जाती है.कहतें हैं कि सन 1598 में हैदराबाद में प्लेग कि महामारी फैल गई .जब शहर महामारी से निजात पाया तो उस ख़ुशी में इस चार मीनारों  वाली ईमारत  "चारमीनार" का निर्माण कराया गया.बहुत ही काम लोगों को पता है कि इसे "विजय महल "के नाम से भी जाना जाता है.55 मीटर ऊँचे इस भवन के चारों तरफ  चार मीनारें हैं ,जिसमें 146  सीडियां हैं.इसके आलावा इस भवन में विभिन्न आकर के 140 बुर्ज हैं.इसे देखने हर रोज हजारों देशी-विदेशी पर्यटक हैदराबाद आते हैं.
कैसे  पहुंचे :हैदराबाद (सिकंदराबाद)देश के सभी प्रमुख शहरों से हवाई, रेल एवम सड़क मार्ग से जुडा हुआ है.
कहाँ रुकें :हर तरह के होटल व लाज हैं.                                                                                                        कुसुम श्रीवास्तव

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